महात्मा बुद्ध के शैक्षिक चिंतन में नैतिक एवं चारित्रिक शिक्षा का स्वरूपरू वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के संदर्भ में एक अध्ययन
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Abstract
भारतीय शिक्षा परंपरा का मूल उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि व्यक्ति के नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक विकास को सुनिश्चित करना भी रहा है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में विज्ञान, तकनीक और व्यावसायिक दक्षता पर विशेष बल दिए जाने के कारण नैतिक एवं चारित्रिक मूल्यों का पक्ष अपेक्षाकृत कमजोर हुआ है। इसके परिणामस्वरूप विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता, असहिष्णुता, हिंसात्मक प्रवृत्तियाँ, प्रतिस्पर्धात्मक तनाव, नैतिक भ्रम तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की कमी जैसी समस्याएँ बढ़ती दिखाई देती हैं। ऐसे समय में महात्मा बुद्ध का शैक्षिक चिंतन अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है, क्योंकि उनकी शिक्षा का आधार करुणा, मैत्री, अहिंसा, सत्य, आत्मानुशासन, विवेक और मध्यम मार्ग जैसे सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत हैं।
प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य महात्मा बुद्ध के शैक्षिक चिंतन में निहित नैतिक एवं चारित्रिक शिक्षा के स्वरूप का अध्ययन करना तथा वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के संदर्भ में उसकी उपयोगिता का विश्लेषण करना है। अध्ययन गुणात्मक शोध पद्धति पर आधारित है, जिसमें प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोतों का उपयोग किया गया है। त्रिपिटक, धम्मपद, बौद्ध साहित्य, शिक्षा-दर्शन संबंधी ग्रंथों, शोध-पत्रों तथा समकालीन शिक्षा नीतियों का विश्लेषण इस अध्ययन का आधार है।
अध्ययन से स्पष्ट होता है कि बुद्ध की शिक्षा केवल धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि मानव जीवन के समग्र विकास की व्यवहारिक प्रणाली है। उनकी शिक्षा में चरित्र निर्माण, आत्मसंयम, विवेकपूर्ण निर्णय, नैतिक उत्तरदायित्व और सामाजिक समरसता को विशेष महत्व दिया गया है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में यदि इन मूल्यों को समुचित स्थान दिया जाए, तो विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का संतुलित विकास संभव है तथा शिक्षा अपने वास्तविक उद्देश्य की ओर अग्रसर हो सकती है।
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