वाल्मीकि रामायण में नारी-चेतना: एक समीक्षात्मक अध्ययन
Main Article Content
Abstract
भारतीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परम्परा में नारी का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा है। वैदिक ऋषिकाओं से लेकर संस्कृत महाकाव्यों की नायिकाओं तक नारी के व्यक्तित्व में ज्ञान, संवेदना, त्याग, साहस, स्वाभिमान, नीति-बुद्धि और आत्मनिर्णय के विविध रूप अभिव्यक्त हुए हैं। आदिकवि वाल्मीकि द्वारा प्रणीत रामायण इस दृष्टि से विशेष महत्त्व रखती है, क्योंकि इसमें नारी केवल पारिवारिक संबंधों की संवाहिका नहीं, बल्कि कथा, धर्म और नैतिक विमर्श को दिशा प्रदान करने वाली सक्रिय शक्ति के रूप में भी उपस्थित है।®
सीता, कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी, तारा, मन्दोदरी, अहल्या और शबरी जैसे स्त्री-पात्र
नारी-जीवन के अलग-अलग पक्षों को उद्घाटित करते हैं। विशेषतः सीता के व्यक्तित्व में दाम्पत्य-निष्ठा के साथ स्वाभिमान, स्वतंत्र निर्णय, विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और नैतिक दृढ़ता का उल्लेखनीय समन्वय दिखाई देता है। तारा राजनीतिक दूरदर्शिता एवं नीति-बुद्धि का प्रतिनिधित्व करती हैं, जबकि मन्दोदरी अन्याय के विरुद्ध विवेकपूर्ण असहमति का स्वर प्रस्तुत करती हैं।
प्रस्तुत शोध-पत्र में ‘नारी-चेतना’ को आधुनिक स्त्री-विमर्श की अवधारणा मात्र के रूप में प्राचीन ग्रन्थ पर आरोपित न करके, नारी के आत्मबोध, स्वाभिमान, निर्णय-क्षमता, सामाजिक स्थिति, कर्तव्य-बोध, नैतिक विवेक और प्रतिरोध-चेतना के व्यापक संदर्भ में ग्रहण किया गया है। वाल्मीकि रामायण को अध्ययन का मूल आधार बनाते हुए आवश्यकतानुसार महाभारत, कालिदास के रघुवंश एवं कुमारसम्भव आदि संस्कृत ग्रन्थों में अभिव्यक्त नारी-दृष्टि को भी समीक्षात्मक संदर्भ के रूप में ग्रहण किया जाएगा।
इस अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि वाल्मीकि रामायण की नारी केवल त्याग और सहनशीलता की प्रतिमूर्ति नहीं है, बल्कि अनेक प्रसंगों में वह विचारशील, निर्णयक्षम, स्वाभिमानी और नैतिक रूप से सजग व्यक्तित्व के रूप में सामने आती है। इस प्रकार रामायण में नारी-चेतना का अध्ययन प्राचीन भारतीय समाज की स्त्री-दृष्टि को समझने के साथ-साथ भारतीय साहित्य में नारी-अस्मिता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने में भी सहायक सिद्ध होता है।
Article Details

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial 4.0 International License.
References
वाल्मीकि, श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण, बालकाण्ड, गीताप्रेस, गोरखपुर।
वाल्मीकि, श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण, अयोध्याकाण्ड, राम-सीता वनगमन प्रसंग।
बलदेव उपाध्याय, संस्कृत साहित्य का इतिहास, शारदा निकेतन, वाराणसी।
ऋग्वेद, विभिन्न ऋषिका-सूक्तय वैदिक स्त्री की बौद्धिक परम्परा के संदर्भ में।
व्यास, महाभारत, सभापर्व एवं स्त्रीपर्व, गीताप्रेस, गोरखपुर।