यज्ञ-विधियों की वैज्ञानिकता: एक समीक्षात्मक अध्ययन

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डॉ सुरेश कुमार

Abstract

यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म[1]  सम्पूर्ण विश्व में यदि कोई श्रेष्ठतम कर्म है तो वह यज्ञ ही है। अपनी अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए अपनी शक्ति के अनुसार तत्तत् द्रव्यों से किसी अभीष्ट के निमित्त किया जाने वाला कर्म एक आराधना विशेष हैं। यह आराधना यदि विधिवत् की जाती है तो वह फलप्रद होती है, अन्यथा वह श्रममात्र है; उससे कोई लाभ नहीं होता। विधिहीन आराधना से आराध्य सन्तुष्ट नहीं होता। अपने अभीष्ट की प्राप्ति हेतु प्राचीन ऋषि-महर्षियों के द्वारा आराध्य को सन्तुष्ट करने के लिए जो क्रिया-कलाप प्राप्त किया गया, वह यज्ञ है। उस यज्ञ से उन ऋषि-महर्षियों ने आराध्य परमेश्वर के लिए यजन किया। यजन ही यज्ञ का स्वरूप है। यजन करने से वह आराध्य देव भी यज्ञ के नाम से वेदों में अभिहित हुआ। मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने देखा कि ‘‘यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः।’’


 


 

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डॉ सुरेश कुमार. (2025). यज्ञ-विधियों की वैज्ञानिकता: एक समीक्षात्मक अध्ययन. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 2(4), 962–973. Retrieved from https://www.ijarmt.com/index.php/j/article/view/1283
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References

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