कृष्णपरिणयं महाकाव्य में हिडिम्बा व भीम का प्रेम प्रसंग

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डाॅ॰ प्रो॰ दीपिका वर्मा
गीता

Abstract

जयनारायणयात्री संस्कृत के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उनकी काव्य कृतियों को भारतीय तथा विदेशी साहित्य शास्त्रियों ने प्रमुख रूप से काव्य सर्जन करने में उनकी विशेष रूप से प्रशंसा की है। संस्कृत साहित्य प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान समय तक समाज में अपना विशेष योगदान देता रहा है। आधुनिक काल के संस्कृत के अनेक साहित्यकारों तथा समीक्षकों ने भी साहित्य के संवर्धन में उनका योगदान अविस्मरणीय माना है। किसी भी महाकवि से वर्तमान समय में अपेक्षा की जाती है कि उसे विविध विषयों का समुचित ज्ञान हो तथा वह भाव पक्ष के साथ-साथ कला पक्ष की भी जानकारी रखता हो । कवि जयनारायण यात्री भी इस अपेक्षा पर खरे उतरते है। जयनारायणयात्री ने भी मानव स्वभाव एवं मनोदशाओं को जितनी स्वाभाविकता से चित्रित किया है उतना संभवतः अन्य किसी संस्कृत कवि ने शायद ही किया हो । अतः इससे प्रकट होता है कि कालिदास को मानव-मनोविज्ञान का सूक्ष्म ज्ञान था।

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How to Cite
डाॅ॰ प्रो॰ दीपिका वर्मा, & गीता. (2025). कृष्णपरिणयं महाकाव्य में हिडिम्बा व भीम का प्रेम प्रसंग. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 2(4), 314–321. Retrieved from https://www.ijarmt.com/index.php/j/article/view/599
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References

काव्यप्रकाश (मम्मट)ः सम्पा॰ डाॅ॰ श्रीनिवासशास्त्री, साहित्य भण्डार, मेरठ, 1960 ।

. काव्यालंकार (भामह): सम्पा॰ डाॅ॰ रमण कुमार शर्मा, विद्यानिधि प्रकाशन, दिल्ली, 1960। प्रथम परिच्छेद, 2 कारिका) सम्पा॰ के॰ पी॰ केसवान, राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान, नई दिल्ली, 1.21

. कृष्णपरिणयं (जयनारायणयात्री) प्रकाशक बालकृष्ण शर्मा एडवोकेट 3जी स्कूल कम कनाल एरिया, नीलाखेड़ी, करनाल (हरियाणा), प्रथम संस्करण, 2020 ।

. वही, 6.17

. सुयोग्यः पतिर्मेयुवा विद्यतेऽयं

न मंस्ये स्वबन्धूक्तवाणीं कदापि

पतिप्रेम नार्यै समस्तोच्चमस्ति

समंतेनबन्धो नसौहार्द मेव । कृ॰ परि॰, 6.13

. विलोक्य स्मरार्ता विजाताऽसुरीसा

युवानं मनोज्ञतदा भीमसेनम् ।

यथेच्छं स्वरूपं विधातुं समर्था

तदाऽसीद हिडिम्बा चकाराचिरेण ।। वही, 6.15