आधुनिक समाज में वाक्-तत्त्व की भूमिका

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सुलभा
डॉ. पटेल सिंह

Abstract

उपनिषदों में वाक्-तत्त्व को एक दैवी शक्ति, ब्रह्म की अभिव्यक्ति और आत्मा की सक्रियता का प्रतीक माना गया है। वाक् केवल ध्वनि या शब्द नहीं है, बल्कि वह चेतना है जो विचारों, अनुभूतियों और ज्ञान को एक व्यक्ति से दूसरे तक संप्रेषित करती है। आधुनिक समाज में जहाँ संवाद की गति और प्रभाव अभूतपूर्व रूप से बढ़ गया है, वहाँ वाक्-तत्त्व की उपनिषदिक समझ अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है। आज का समाज एक “सूचना समाज” बन चुका है, जहाँ वाणी के विभिन्न रूप-मौखिक, लिखित, डिजिटल के माध्यम से विचारों, सूचनाओं और भावनाओं का असीमित आदान-प्रदान हो रहा है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, समाचार माध्यम और वैश्विक मंचों पर व्यक्ति की वाणी न केवल उसकी पहचान बन चुकी है, बल्कि उसकी सोच, दृष्टिकोण और प्रभाव का भी माध्यम बन गई है। इस परिप्रेक्ष्य में उपनिषदों का वाक्-तत्त्व हमें यह सिखाता है कि वाणी का उपयोग विवेकपूर्वक, सत्यनिष्ठा से और कल्याणकारी दृष्टिकोण से होना चाहिए।

Article Details

How to Cite
सुलभा, & डॉ. पटेल सिंह. (2025). आधुनिक समाज में वाक्-तत्त्व की भूमिका. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 2(4), 389–394. Retrieved from https://www.ijarmt.com/index.php/j/article/view/636
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References

शर्मा, अरविंद, वेदिक साहित्य में वाक् की अवधारणा, मोतीलाल बनारसीदास, पृ. 54

बृहदारण्यक उपनिषद 4.1.2

कपूर, अनुराधा, एक्टर्स, पिलग्रिम्स, किंग्स एंड गॉड्स द रामलीला एट रामनगर, सीगल बुक्स, 1993 पृ. 28

ड्यूसेन, पॉल, द फिलॉसफी ऑफ द उपनिषद्स, डोवर पब्लिकेशन्स, 2010 पृ. 84

अथर्ववेद - काण्ड 6, सूक्त 120, मंत्र 3

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