कथाकार भगवानदास मोरवाल कृत ‘रेत’ उपन्यास में कंजर जनजाति का लोक-व्यवहार एवं संस्कृति
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हिन्दी में ‘जनजाति’ शब्द के पर्याय में ‘आदिम जाति’, ‘आदिवासी’, ‘कबीला’, ‘मूलनिवासी’ आदि शब्दों का प्रचलन है। जनजाति मानव समुदायों का एक ऐसा संगठन है, जिनकी विशिष्ट संस्कृति और समान परम्पराएं होती है, जो प्रायः एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में सामान्य विशेषताओं को अपनाये हुए चली आ रही होती है। जनजाति स्थायी और अस्थायी रूप से परिवार-समूहों से उठकर एक राजनीतिक संगठन होता है, जिनकी समान भाषा, समान संस्कृति और समान विचारधारा या आदर्श होते हैं। आदर्श रूप में, आमतौर पर जनजाति के सदस्यों द्वारा एक विशिष्ट नाम स्वीकृत किया जाता है। वे निश्चित प्रदेश में निवास करते हुए व्यापार, कृषि, घर निर्माण, युद्ध और अन्य औपचारिक गतिविधियों में सामूहिक रूप से कार्य करते हैं। जीविका उपार्जन के लिए जितना आवश्यक है, उतना ही उत्पादन करने की क्षमता रखने वाले जनसमूहों को आदिवासी या जनजाति कहा जाता है। ‘जनजाति’ शब्द के सामाजिक वर्ग की अवधारणा आदिम मानव के समूहों के रूप में होती है। जिनकी अपनी विशिष्ट परम्पराएं और सांस्कृतिक विरासत रही है। जिसका विकास प्रत्येक जनजाति में पीढ़ी-दर-पीढ़ी होता रहा है। प्रस्तुत आलेख में भगवानदास मोरवाल कृत ‘रेत’ उपन्यास में कंजर जनजाति के लोक-व्यवहार एवं संस्कृति पर प्रकाश डाला गया है।
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References
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विजय बहादुर सिंह, उपन्यास और फार्मूलाबाजी (समीक्षा), नया ज्ञानोदय, अक्तूबर, 2008, अंक-68, पृ. 78
भगवानदास मोरवाल, रेत, पृ. 05
भारत भारद्वाज, अभिशप्त समाज का दर्द (समीक्षा), इंडिया टुडे, 12-18 जून, 2008, अंक-34, पृ. 57
भगवानदास मोरवाल, रेत, पृ. 111
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भगवानदास मोरवाल, रेत, पृ. 22
वही, पृ. 27
वही, पृ. 93)