जनजातीय समाजों में स्त्री की स्थिति और संघर्ष चेतना

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डॉ.नांग सुलिना चाउतांग

Abstract

हिन्दी के रचनाकारों ने सामाजिक परिप्रेक्ष्य में आदिवासी-जनजातीय स्त्रियों की स्थिति और उनके संघर्षशील पहलुओं को संवेदनात्मक धरातल पर अभिव्यक्ति दी है। जनजातीय समाजों में पहले स्त्री का स्थान परिवार की मुखिया के रूप में होता था। पुरुष की बराबरी में अपनी जाति, परिवार, युद्ध, जीवन के संघर्ष, आजीविका के प्रश्नों से सम्बन्धित प्रत्येक गतिविधियों में स्त्री सक्रिय सहयोग प्रदान करती थी। पर जैसे-जैसे जनजातीय समाजों का विकास होता गया और वे अन्य समाजों के सम्पर्क में आते गए तो परिवार की मुखिया के रूप में निर्धारित स्त्री का महत्त्व कम होता गया। अब बहुतांश जनजातियों में स्त्री का महत्त्व परिवार की मुखिया के रूप में नहीं है, बल्कि उसे दोयम दर्जे का स्थान प्राप्त हो चुका है। जिस तरह गैर आदिवासी समाजों में पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने अपनी सुविधा के अनुसार नियम-कानून बनाकर स्त्रियों को दोयम दर्जे पर पहुंचाया है। ठीक उसी तरह जनजातियों के पुरुष वर्ग ने भी धर्म और जाति पंचायतों के नियम निर्धारित किये हैं। प्रस्तुत आलेख में सभी प्रमुख उपन्यासकारों ने अपने उपन्यास के माध्यम से जनजातीय समाजों में स्त्री की स्थिति और उनकी संघर्ष चेतना को दिखाने का प्रयास किया है।

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How to Cite
डॉ.नांग सुलिना चाउतांग. (2026). जनजातीय समाजों में स्त्री की स्थिति और संघर्ष चेतना. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 3(1), 417–423. Retrieved from https://www.ijarmt.com/index.php/j/article/view/726
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Articles

References

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