समकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श: चयनित उपन्यासों का आलोचनात्मक अध्ययन
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Abstract
समकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श एक बहुआयामी और सशक्त चिंतनधारा के रूप में उभरकर सामने आया है, जो स्त्री के अस्तित्व, अस्मिता और अधिकारों के प्रश्नों को केंद्र में स्थापित करता है। इस अध्ययन में चित्रा मुद्गल के ‘आवा’, मृदुला गर्ग के ‘चित्तकोबरा’, मैत्रेयी पुष्पा के ‘इदन्नमम’ तथा प्रभा खेतान के ‘उपनिवेश में स्त्री’ का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इन उपन्यासों के माध्यम से शहरी और ग्रामीण दोनों संदर्भों में स्त्री के संघर्ष, यौनिक स्वतंत्रता, सामाजिक शोषण, तथा आत्मचेतना के विभिन्न आयामों को रेखांकित किया गया है। अध्ययन यह दर्शाता है कि समकालीन हिंदी उपन्यासों में स्त्री केवल पीड़िता नहीं, बल्कि एक सक्रिय, सजग और प्रतिरोधी व्यक्तित्व के रूप में उभरती है, जो पितृसत्तात्मक संरचनाओं को चुनौती देते हुए अपनी पहचान और अधिकारों की पुनर्स्थापना करती है।
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