वैदिक साहित्य में राज्य के प्रारम्भिक तत्त्व : ऋग्वेद, अथर्ववेद एवं ब्राह्मण ग्रंथों का राजनीतिक अध्ययन
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वैदिक साहित्य का राजनीतिक अध्ययन एक विशिष्ट पद्धतिगत चुनौती प्रस्तुत करता है। इसका कारण यह नहीं है कि वैदिक साहित्य में राजनीतिक जीवन के संकेत उपलब्ध नहीं हैं, बल्कि यह है कि वे किसी क्रमबद्ध राज्यशास्त्रीय प्रतिपादन के रूप में न होकर मंत्रों, आख्यानों, अनुष्ठानों तथा सामाजिक संदर्भों में अंतर्निहित रूप से व्यक्त होते हैं। परिणामस्वरूप इनके आधार पर राज्य-संबंधी अवधारणाओं का अध्ययन एक विशिष्ट पद्धतिगत सावधानी की अपेक्षा करता है। (जैमिसन, स्टेफ़नी डब्ल्यू., एवं ब्रेरेटॉन, जोएल पी. (अनु.). (2014); कीथ, ए. बी,1925)
इसी कारण वैदिक साहित्य के राजनीतिक अध्ययन में दो पद्धतिगत चुनौतियाँ सामने आती हैं। पहली, परवर्ती भारतीय राज्य-सिद्धांतों के आलोक में वैदिक साहित्य की व्याख्या करने से उसके मूल ऐतिहासिक संदर्भ पर उत्तरवर्ती राजनीतिक अवधारणाओं का आरोपण होने लगता है। दूसरी, वैदिक साहित्य में राज्य पर किसी व्यवस्थित प्रतिपादन के अभाव को राजनीतिक चिंतन के अभाव के रूप में ग्रहण कर लिया जाता है। दोनों स्थितियों में वैदिक साहित्य की अपनी वैचारिक विशिष्टता पर्याप्त रूप से उद्घाटित नहीं हो पाती। अतः आवश्यक है कि वैदिक ग्रंथों को उनके अपने ऐतिहासिक तथा वैचारिक संदर्भ में पढ़ते हुए उनमें निहित राजनीतिक अवधारणाओं का परीक्षण किया जाए। (थापर, रोमिला, 1984, 2002)
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References
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