समकालीन हिंदी साहित्य में सामाजिक न्याय, लोकतंत्र, जातिवाद, स्त्री-विमर्श एवं राजनीतिक संकटों की अभिव्यक्ति का अध्ययन

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अंकित श्रीवास्तव, डॉ. बलप्रदा श्रीवास्तव

Abstract

समकालीन हिंदी साहित्य में सामाजिक संबंधों का चित्रण व्यक्ति की निजी अनुभूतियों और सार्वजनिक जीवन की परिस्थितियों को एक साथ सामने लाता है। सामाजिक न्याय, लोकतंत्र, जातिगत असमानता, स्त्री की स्वायत्तता और राजनीतिक संकट इसी संबंध के प्रमुख आयाम हैं। प्रस्तुत लेख का उद्देश्य इन विषयों की साहित्यिक अभिव्यक्ति को चयनित हिंदी कृतियों के संदर्भ में समझना तथा उनके पारस्परिक संबंध स्पष्ट करना है। अध्ययन की प्रकृति गुणात्मक, वर्णनात्मक और व्याख्यात्मक है। इसमें उपन्यास, आत्मकथा और कविता की चयनित रचनाओं के विषयगत संकेतों को साहित्य तथा सामाजिक चिंतन से संबंधित प्रामाणिक स्रोतों के साथ पढ़ा गया है। ‘राग दरबारी’, ‘महाभोज’, ‘जूठन’, ‘मुर्दहिया’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘आपका बंटी’, ‘तमस’, ‘कितने पाकिस्तान’, ‘कथा सतीसर’, ‘रेत-समाधि’ और ‘संसद से सड़क तक’ अध्ययन के मुख्य साहित्यिक उदाहरण हैं। विवेचन से स्पष्ट होता है कि साहित्य में न्याय केवल आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता का प्रश्न नहीं रहता; वह सम्मान, अभिव्यक्ति, शिक्षा, स्मृति और निर्णय में भागीदारी से भी जुड़ता है। लोकतंत्र का अर्थ संस्थागत व्यवस्था के साथ सामान्य व्यक्ति की सुनवाई से विकसित होता है। जाति और पितृसत्ता व्यक्ति के अवसरों तथा आत्मबोध को प्रभावित करती हैं, जबकि राजनीतिक हिंसा घर, समुदाय और सांस्कृतिक स्मृति को असुरक्षित बनाती है। इन अनुभवों की प्रस्तुति में आत्मकथात्मक स्वर, संवाद, व्यंग्य, बहुस्वरता और स्मृति की विशेष भूमिका दिखाई देती है। लेख का केंद्रीय निष्कर्ष है कि चयनित साहित्यिक रचनाओं को इन पाँच विषयों के संयुक्त संदर्भ में पढ़ने से नागरिक गरिमा और मानवीय संबंधों की अधिक व्यापक समझ विकसित होती है।

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अंकित श्रीवास्तव, डॉ. बलप्रदा श्रीवास्तव. (2026). समकालीन हिंदी साहित्य में सामाजिक न्याय, लोकतंत्र, जातिवाद, स्त्री-विमर्श एवं राजनीतिक संकटों की अभिव्यक्ति का अध्ययन. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 3(3), 1071–1085. Retrieved from https://www.ijarmt.com/index.php/j/article/view/1302
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