उपनिषदों में ब्रह्म विवेचन: एक समीक्षात्मक अध्ययन

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डाॅ॰ हरिओम
रामसिंह

Abstract

उपनिषद्् भारतीय दर्शन के वे आधार स्तंभ हैं जिनका मुख्य उद्देश्य बाहरी कर्मकांड के स्थान पर आत्म-साक्षात्कार और परम सत्य की खोज करना है। इन ग्रंथों में ब्रह्म को किसी व्यक्ति या देवता के अतिरिक्त उस मूल तत्त्व के रूप में परिभाषित किया गया है जो संपूर्ण अस्तित्व का आधार और सर्वव्यापी सत्ता है। शोध स्पष्ट करता है कि सृष्टि के देवता ‘ब्रह्मा’ और उपनिषदों के ‘ब्रह्म’ में मौलिक अंतर है, जहाँ ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनंतता का प्रतीक है। निर्गुण और निराकार ब्रह्म को समझने के लिए ‘नेति-नेति’ (यह नहीं, वह नहीं) की पद्धति अपनाई गई है, जो यह दर्शाती है कि परम सत्य को शब्दों या सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता। उपनिषदों का केंद्रीय दर्शन आत्मा और ब्रह्म की पूर्ण एकता है, जिसे ‘तत्त्वमसि’ और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ जैसे महावाक्यों के माध्यम से सिद्ध किया गया है। आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत के अनुसार, जीव और ब्रह्म के बीच दिखने वाला भेद मात्र ‘अविद्या’ का परिणाम ज्ञान का वास्तविक अर्थ केवल जानकारी जुटाना नहीं, अपितु अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप को पहचानकर अज्ञान के बंधनों को समाप्त करना है। मोक्ष को यहाँ किसी परलोक की प्राप्ति के अतिरिक्त, इसी जीवन में भय और मोह से मुक्ति तथा आंतरिक स्वतंत्रता के अनुभव के रूप में देखा गया है। अंततः, यह ब्रह्म-विवेचन मनुष्य को उसकी संकीर्ण पहचान से ऊपर उठाकर व्यापकता और आध्यात्मिक गहराई प्रदान करता है।

Article Details

How to Cite
डाॅ॰ हरिओम, & रामसिंह. (2025). उपनिषदों में ब्रह्म विवेचन: एक समीक्षात्मक अध्ययन. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 2(4), 719–728. Retrieved from https://www.ijarmt.com/index.php/j/article/view/913
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References

ऐतरेयोपनिषद्. प्राचीन. मूल संस्कृत पाठ।

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छांदोग्योपनिषद्. प्राचीन. मूल संस्कृत पाठ।

तैत्तिरीयोपनिषद्. प्राचीन. मूल संस्कृत पाठ।

माण्डूक्योपनिषद्. प्राचीन. मूल संस्कृत पाठ।

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