योग एवं स्वास्थ्य: वैदिक परंपरा से आधुनिक जीवन तक एक समग्र दृष्टि
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Abstract
योग को प्रायः केवल आसन अथवा शारीरिक व्यायाम तक सीमित मान लिया जाता है; किंतु भारतीय आर्ष-परंपरा में यह जीवन को ‘आधि’ एवं ‘व्याधि’ से मुक्त कर ‘समाधि’ की ओर ले जाने वाली एक समग्र विद्या है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य योग की वैदिक उत्पत्ति, उसके आदि-वक्ता की अवधारणा तथा महर्षि पतंजलि-प्रणीत चित्त की पंचवृत्तियों को वर्तमान सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन के धरातल पर पुनर्व्याख्यायित करना है। साथ ही आयुर्वेद की ‘स्वस्थ’ विषयक परिभाषा के आलोक में शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक स्वास्थ्य के त्रिआयामी स्वरूप का विश्लेषण किया गया है। वेद, महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता, हठयोगप्रदीपिका एवं सुश्रुतसंहिता के प्रामाणिक उद्धरणों के आधार पर यह प्रतिपादित किया गया है कि आहार, निद्रा एवं ब्रह्मचर्य रूपी तीन स्तंभों, गहन श्वसन तथा ओंकार-उच्चारण के माध्यम से बाह्य जगत से अंतर्जगत की ओर की गई यात्रा ही वास्तविक आरोग्य एवं आत्म-स्थिति का मार्ग है। निष्कर्षतः योग आत्म-अनुशासन पर आधारित वह जीवन-पद्धति है जो व्यक्ति, परिवार एवं समाज—तीनों को संतुलित करती है।
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References
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