गांधीवादी आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी और सामाजिक परिवर्तन
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Abstract
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के गांधीवादी चरण ने राजनीति को केवल सत्ता-प्राप्ति का माध्यम न बनाकर उसे एक व्यापक सामाजिक और नैतिक आंदोलन का रूप प्रदान किया। इस परिवर्तनकारी प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी ने न केवल आंदोलन को जन-आधारित बनाया, बल्कि भारतीय समाज की संरचना में भी गहरे परिवर्तन की नींव रखी। असहयोग आंदोलन (1920–22) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–34) के दौरान महिलाओं की सक्रिय सहभागिता ने पारंपरिक लैंगिक सीमाओं को चुनौती दी और सार्वजनिक जीवन में स्त्री की भूमिका को पुनर्परिभाषित किया। यह शोध-पत्र गांधीवादी आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी का ऐतिहासिक-विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है तथा यह स्पष्ट करता है कि महिलाओं की भूमिका केवल अनुयायी या सहायक की नहीं थी, बल्कि वे आंदोलन की वैचारिक, संगठनात्मक और क्रियात्मक शक्ति थीं। विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार, चरखा आंदोलन, नमक सत्याग्रह, प्रभात फेरियाँ, गिरफ्तारी, जेल-यात्रा और रचनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाओं ने राष्ट्रीय आंदोलन को सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन में परिवर्तित कर दिया। अध्ययन यह भी दर्शाता है कि गांधीवादी विचारधारा ने महिलाओं को नैतिक बल, आत्मविश्वास और सार्वजनिक स्वीकृति प्रदान की, जिससे शिक्षा, सामाजिक सुधार, आत्मनिर्भरता और राजनीतिक चेतना के क्षेत्रों में दीर्घकालिक परिवर्तन संभव हुए। इस प्रकार, यह शोध महिलाओं की गांधीवादी आंदोलनों में भागीदारी को भारतीय समाज के आधुनिकीकरण और लोकतांत्रिक चेतना के विकास की एक केंद्रीय प्रक्रिया के रूप में स्थापित करता है।
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