भारतेंदु हरिश्चन्द्र के नाटकों में सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध सुधारवादी चेतना

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वल्लभीसिंह, डॉ. गणेशलाल जैन

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उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्ध भारतीय समाज के लिए संक्रमण का काल था, जहाँ एक ओर औपनिवेशिक शासन के कारण सामाजिक‑आर्थिक संरचनाएँ प्रभावित हो रही थीं, वहीं दूसरी ओर नवजागरण की चेतना भी आकार ले रही थी। इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भारतेंदु हरिश्चन्द्र हिंदी नाट्य साहित्य के ऐसे अग्रदूत के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं, जिन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित न रखकर उसे सामाजिक हस्तक्षेप का सशक्त माध्यम बनाया। उनके नाटकों में व्याप्त सुधारवादी चेतना सामाजिक कुरीतियों—जैसे अंधविश्वास, रूढ़िवाद, धार्मिक पाखंड, स्त्री‑अवमानना, नैतिक पतन और औपनिवेशिक मानसिकता—के विरुद्ध संघर्षरत दिखाई देती है। प्रस्तुत सैद्धान्तिक अध्ययन का उद्देश्य भारतेंदु हरिश्चन्द्र के नाटकों में निहित सामाजिक कुरीतियों के आलोचनात्मक विवेचन तथा सुधारवादी वैचारिकी के सैद्धान्तिक आधारों की पड़ताल करना है। यह अध्ययन यह प्रतिपादित करता है कि भारतेंदु के नाटक  तत्कालीन समाज की विकृतियों का अनावरण करते हैं, बल्कि सामाजिक पुनर्निर्माण की दिशा भी प्रस्तावित करते हैं।

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वल्लभीसिंह, डॉ. गणेशलाल जैन. (2025). भारतेंदु हरिश्चन्द्र के नाटकों में सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध सुधारवादी चेतना. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 2(4), 512–521. Retrieved from https://www.ijarmt.com/index.php/j/article/view/716
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