भू राजस्व के विशेष संदर्भ में भू राजस्व व्यवस्था का उदय और विकासः एक अध्ययन
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Abstract
प्राचीन भारत में एक सुव्यवस्थित भू राजस्व प्रथा विद्यमान थी जो राज्य की आय का प्रमुख स्त्रोत थी। इस अध्ययन का उदेश्य भारत में भू राजस्व के उदय और विकास की जांच करना है। वैदिक काल में, जमीन को ज्यादातर समुदाय की सम्पति समझी जाती थी, जबकि राजा उसके रक्षक के तौर पर काम करता था। इस सुरक्षा और प्रशासनिक कार्यों के बदले में, राजा खेती की उपज का एक हिस्सा इकट्ठा करता था, जिसे आमतौर पर भाग कहा जाता है। अर्थशास्त्र में कहा गया है कि भू राजस्व उपज का लगभग छठा हिस्सा कर के तौर पर लिया जाना चाहिए । इसी तरह, मनुस्मृति भी राजा को खेती की उपज का एक हिस्सा राजस्व के तौर पर लेने का अधिकार देती है। भू राजस्व व्यवस्था का विकास राजनितिक अधिकार , प्रशासनिक संगठन और खेती की पैदावार से करीब से जुड़ा था। इसने न सिर्फ राज्य की आर्थिक नींव का काम किया, बल्कि पुराने भारत के खेती के ढांचे और ग्रामीण समाज को बनाने में भी अहम भूमिका निभाई।
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