उत्तररामचरित में धर्म और राजनीति का अंतर्संबंध

Main Article Content

Dr. Parveen Kumar

Abstract

भवभूति का उत्तररामचरित संस्कृत नाट्य साहित्य का एक अनुपम ग्रंथ है, जिसमें राम के उत्तरकांड का नाट्यरूप प्रस्तुत किया गया है। इस नाटक में धर्म और राजनीति का अंतर्संबंध अत्यंत गहन रूप से उभरता है। धर्म यहाँ केवल धार्मिक कर्मकांड या आचार-विधि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, लोकहित और राजधर्म की संकल्पना का प्रतीक है। राजनीति भी केवल सत्ता-संचालन या प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि धर्माधारित शासन की रूपरेखा है। राम का चरित्र इस अंतर्संबंध का आदर्श प्रतिरूप है। वे व्यक्तिगत सुख और पारिवारिक कर्तव्यों का त्याग कर जनकल्याण को प्रधानता देते हैं। सीता-त्याग प्रसंग इस द्वंद्व का सबसे मार्मिक उदाहरण है, जहाँ व्यक्तिगत धर्म (पत्नी का संरक्षण और पारिवारिक दायित्व) तथा राजधर्म (जनमत का पालन और प्रजा की अपेक्षाओं का निर्वाह) आमने-सामने आते हैं। भवभूति ने इस प्रसंग के माध्यम से यह प्रतिपादित किया कि राजनीति को धर्म का आधार लेना चाहिए, अन्यथा शासन लोकहित से विमुख हो जाएगा।


इस नाटक में धर्म और राजनीति का संबंध विरोधी नहीं, बल्कि पूरक रूप में प्रस्तुत किया गया है। धर्म राजनीति को नैतिकता और न्याय का आधार प्रदान करता है, जबकि राजनीति धर्म को सामाजिक और प्रशासनिक रूप देती है। भवभूति का संदेश स्पष्ट है कि शासक को व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर धर्माधारित राजनीति करनी चाहिए। यही दृष्टि भारतीय राजनीतिक परंपरा में राजधर्म की संकल्पना को पुष्ट करती है। इस शोध-पत्र का उद्देश्य उत्तररामचरित में धर्म और राजनीति के अंतर्संबंध का विश्लेषण करना है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि भारतीय चिंतन में आदर्श शासन की नींव धर्म और राजनीति के समन्वय पर आधारित है। यह अध्ययन न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, बल्कि भारतीय राजनीतिक दर्शन की मूल धारा को भी उजागर करता है।

Article Details

How to Cite
Dr. Parveen Kumar. (2025). उत्तररामचरित में धर्म और राजनीति का अंतर्संबंध. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 2(4), 767–773. Retrieved from https://www.ijarmt.com/index.php/j/article/view/977
Section
Articles

References

वाल्मीकि रामायण – मूल संस्कृत पाठ एवं विभिन्न टीकाएँ।

महाभारत – धर्म और राजनीति के द्वंद्व का महाकाव्यात्मक आधार।

कालिदास, रघुवंश – राजधर्म और आदर्श शासन का काव्यात्मक चित्रण।

भवभूति, उत्तररामचरित – धर्म और राजनीति के अंतर्संबंध का नाट्यरूप।

पुराण साहित्य – धर्माधारित राजनीति और राजधर्म की संकल्पना।

कौटिल्य, अर्थशास्त्र – राजनीति और शासन की व्यावहारिक दृष्टि।

Similar Articles

1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 > >> 

You may also start an advanced similarity search for this article.