वोट - बैंक की राजनीति और हमारा लोकतंत्र

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डॉ. ओम प्रकाश यादव

Abstract

भारतीय लोकतंत्र की एक विशेषता यह भी है कि राजनीतिक दल प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह चलते हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के नेताओं के अपने - अपने स्वार्थ टकराते हैं। चूँकि वे अलग - अलग सामाजिक आधारों के होते हैं, तो यह स्वाभाविक भी है। सामाजिक समीकरणों के आधार पर चलने वाले राजनीतिक दलों के सामाजिक स्वार्थ होते है और वे व्यक्तियों के माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं।


भारत में औपनिवेशिक दौर में और उसके बाद के शुरूआती दशको में जाति को आधार बनाकर परिवर्तनकारी राजनीति करने की कोशिशे हुई। अम्बेडकर ने दलितों में राजनीतिक चेतना भरने की पुरजोर कोशिश की। दक्षिण भारत में रामास्वामी नायकर पेरियार के नेतृत्व में ब्राह्मण विरोधी आन्दोलन चला। इसी तरह राम मनोहर लोहिया ने पिछड़ो की राजनीतिक गोलबंदी करके कांग्रेस और ऊँची जातियों के वर्चस्व को तोड़ने की कोशिश की। लेकिन उसके बावजूद सामान्यतः जाति और राजनीति के आपसी संबंधो को संदेह की नजर से देखा जाता रहा है। राजनीति में जातिवाद की शिकायत करते हुए अक्सर इसे हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा माना जाता है। आमतौर पर लोकतांत्रिक राजनीति को आधुनिकता और जाति को परंपरा का प्रतीक मानते हुए दोनों के विरोधाभासपूर्ण संबंधो पर जोर देने की प्रवृति रही है।

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How to Cite
डॉ. ओम प्रकाश यादव. (2026). वोट - बैंक की राजनीति और हमारा लोकतंत्र. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 3(2), 1383–1387. Retrieved from https://www.ijarmt.com/index.php/j/article/view/1123
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References

अभय कुमार दूबे (सं.), राजनीति की किताब : रजनी कोठारी का कृतित्व, वाणी प्रकाशन , सीएसडीएस, नई दिल्ली.

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अभय कुमार दुबे (सं.) लोकतंत्र के सात अध्याय, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली 2002.

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