मौर्योत्तर कालीन आर्थिक व्यवस्था एवं केंद्रीय प्रशासन रू एक ऐतिहासिक अध्ययन
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Abstract
मौर्य साम्राज्य के पतन के उपरान्त भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीतिक संरचना में व्यापक परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। लगभग द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व से तृतीय शताब्दी ईस्वी तक का काल भारतीय इतिहास में श्मौर्योत्तर कालश् के रूप में जाना जाता है। इस युग की प्रमुख विशेषता राजनीतिक विकेन्द्रीकरण तथा क्षेत्रीय शक्तियों का उदय था। मौर्यों द्वारा स्थापित अखिल भारतीय राजनीतिक एकता के विघटन के पश्चात् भारत अनेक छोटे.बड़े राज्यों में विभाजित हो गया। उत्तर भारत में शुंगए कण्वए शक तथा कुषाण शासकों ने अपनी सत्ता स्थापित कीए जबकि दक्षिण भारत में सातवाहनों का प्रभाव विद्यमान रहा। इसी प्रकार चोलए पाण्ड्य एवं केरल के राज्य दक्षिणी भारत की राजनीतिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग थे। यद्यपि यह काल राजनीतिक दृष्टि से अस्थिरता का काल माना जाता हैए तथापि आर्थिक जीवन पूर्णतः अवरुद्ध नहीं हुआ। इसके विपरीत कृषिए व्यापारए सिंचाईए भूमिदान तथा भू.राजस्व व्यवस्था में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुएए जिन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को नवीन आधार प्रदान किया। मौर्योत्तर काल की केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था मौर्यकालीन कठोर केन्द्रीकरण की अपेक्षा अधिक क्षेत्रीय एवं विकेन्द्रित स्वरूप की थी। स्थानीय प्रशासनए ग्राम व्यवस्था तथा भू.राजस्व प्रणाली में क्षेत्रीय शासकों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो गई थी। इस काल के शासकों ने अपने.अपने क्षेत्रों में प्रशासनिक स्थिरता स्थापित करने तथा आर्थिक संसाधनों को सुदृढ़ करने के लिए कृषिए सिंचाई एवं व्यापारिक गतिविधियों को प्रोत्साहन प्रदान किया। यही कारण है कि राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद आर्थिक संरचना निरन्तर सक्रिय बनी रही।
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