भारतीय धर्मशास्त्रों में कर्म-पुनर्जन्म का सिद्धान्त : एक विवेचन

Main Article Content

डाॅ0 नीलिमा चैधरी

Abstract

प्राचीन भारतीय चिन्तकों ने कर्म पर गहराई से विचार किया। न्याय, सांख्य, वेदान्त, वैशेषिक मीमांसक, बौद्ध और जैन सभी दार्शनिकों ने कर्मवाद के सम्बन्ध में चिन्तन दिया। केवल दर्शन ही नहीं बल्कि साहित्य, विज्ञान, कला आदि पर भी कर्मवाद की स्पष्ट छाया देखी जा सकती है। विश्व में सर्वत्र विषमता, विचित्रता देखकर विचारकों ने कर्म सिद्धान्त की अद्भुत व्याख्या की। सभी धर्मो में स्पष्ट उल्लेख है कि मनुष्य को उसके सुख-दुःख की प्राप्ति उसके किये गये कर्मों से होती है। कर्म से बंधा हुआ जीव अनादि काल तक विभिन्न योनियों में जन्म (पुनर्जन्म) लेकर अपने कर्म का भोग करता है।
पुनर्जन्म से छुटकारे या मुक्ति का भी प्राविधान भारतीय दर्शन एवं साहित्य में किया गया है। यह विचारणीय है कि पुनर्जन्म होता ही कब है। इस पर विवेकानन्द की टिप्पणी महत्वपूर्ण है, जिससे पता चलता है कि जन्म-मरण चक्र से छुटकारा कैसे प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य का शरीर एवं मन परिवर्तनशील है। देह का नाश तो प्रतिक्षण होता रहता है और मन तो सदा बदलता रहता है। देह तो एक संघात है और उसी तरह मन भी। इसी कारण परिवर्तनशीलता के परे वे नहीं पहुँच सकते। परन्तु स्थूल जड़ भूत के इस क्षणिक आवरण के परे, मन के सूक्ष्म आवरण के भी परे, मनुष्य का सच्चा स्वरूप नित्य मुक्त सनातन आत्मा अवस्थित है।

Article Details

How to Cite
डाॅ0 नीलिमा चैधरी. (2026). भारतीय धर्मशास्त्रों में कर्म-पुनर्जन्म का सिद्धान्त : एक विवेचन. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 3(1), 931–937. Retrieved from https://www.ijarmt.com/index.php/j/article/view/818
Section
Articles

References

पाणिनि - अष्टाध्यायी 1/4/79

वैशेषिक दर्शन भाष्य 1/17, पृ0 35

सांख्य तत्व कौमुदी, पृ0 67

भीष्म पर्व 26/50

यस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमन कुतः चार्वाक सष्टि, पृ0 18

ऋग्वेद 1/22/29

ऋग्वेद 1/62/6, 1/101/4, 10/54/4, 10/131/4

Similar Articles

<< < 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 > >> 

You may also start an advanced similarity search for this article.